2. ९२. स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है @ (पेज -127)
स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ...
✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
आधुनिकता के नए आयाम में,
संस्कृति के संरक्षण-सम्मान में,
जिंदगी की घुटन का एहसास करती है,
स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ...
पिता की इज्जत, माता के दिये संस्कार में,
भाइयों की जिद्द, रिश्तेदारों के अहंकार में,
अपनी दिल की बातों को जुबां से नहीं बयां करती है,
स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ...
हुनर के शिखर, जिंदगी के कठिन सफ़र में,
समाज के गिद्ध निगाहों, शरीफों के गंदे बाज़ार में,
पल पल आबरू की सुरक्षा के लिये संघर्ष करती है,
स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ...
मातृत्व की प्रतिष्ठा, कुल के सम्मान में,
भ्रूण हत्या के क्रूरतम विज्ञान में,
अपनों से अपने अंश के सुरक्षा के लिये लड़ती है,
स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ...
जात-पात और दहेज-दानव के घमासान में,
अपनी पसंद के निरंकुश अपमान में,
अपनों के लिये ग़लत निर्णय के विरोध से डरती है,
स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ...
कुर्बानी और जिल्लत की इंतहां में,
घर-परिवार के ख़ैरियत की पनाह में,
तन्हाई के बीच दूसरों की तन्हाई दूर करती है,
स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ...
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