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8. ९३. जिनकी खुशियां हमसे है, वही आज हमारे लिए पराया है @(पेज - 31)

जिनकी खुशियाँ हमसे है, वही आज हमारे लिये पराया है ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी  जिनके रहमोकरम से हमने यह सतरंगी दुनियाँ पाया है,  रब मैं क्या जानूं रब के बारे में भी जिसने हमें बताया है,  ना जाने किन अपनों के लिये हमने उन्हें रुलाया है,  जिनकी ख़ुशीयां हमसे है, वही आज हमारे लिये पराया है... किसी ख़ास ने कुछ राज हमें बताया है,  उनकी चाहत में खोट है ऐसा हमें  बताया है,  सिर्फ वही हमारी अपनी, मेरे सहोदर से भी उसका मन भर आया है,  जिनकी खुशियाँ हमसे है, वही आज हमारे लिये पराया है, नन्हें अंगुलियों को पकड़ चलना जिसने सिखाया है,  रास्ते के कंकड़ों को चुन जीवनपथ सपाट जिसने बनाया है,   जीवन की अंतिम बेला में उसको हमने बोझ बताया है,  जिनकी खुशियाँ हमसे है, वही आज हमारे लिये पराया है .... मेरे आंखो में आँसू नहीं आये, इसी धुन में जिन्होंने सारी उम्र पसीना बहाया है,  अपनी छाती का दूध पिला कर जिसने ख़ुद रूखा-सूखा खाया है,  किसी अपने ने उसी से अलग मेरे लिये पकवान पकाया है,  ...

7. ऐसी ममता को नित्य नमन (पेज -30)

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ऐसी ममता को नित्य नमन ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी माँ के ममता की छाँव है अनमोल,  इससे बढ़कर नहीं कोई स्वर्ग और भवन,  तेरे आशीषपूर्ण स्पर्श से हर जाए सारे दुःख,  ऐसी ममता क़ो नित्य नम...

6. ९०. तेरा साथ @ (पेज -47)

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तेरा साथ ✍ बिपिन कुमार चौधरी दुनियाँ के इस मेला में,  प्रिय तेरे बिन अकेला मैं,  तुम्हारे मुस्कान की तलाश कर रहा हूँ,  रब से तेरे हीं साथ का मांग कर रहा हूँ .... तेरे नयनों के इस नीड़ में,  विचलित मेरा मन गंभीर मैं,  सुकून के उन लम्हों का तलाश कर रहा हूँ,  रब से तेरे हीं साथ का मांग कर रहा हूँ .... तम से घिरे साग़र में, बहुत ख़ुश हूँ तुझे पाकर मैं,  तेरी खुशियों के लिये विलाप कर रहा हूँ,  रब से तेरे हीं साथ का मांग कर रहा हूँ .... आमवश्या की विलुप्त निशाकर में,  नई उषा की बेला औऱ दिवाकर मैं,  शशि की भाँति ओझल होने का स्वांग कर रहा हूँ, रब से तेरे हीं साथ का मांग कर रहा हूँ ....

5. आखिर क्यों इतना मजबूर इस देश में अन्नदाता है (पेज -45)

अाठ अक्टूबर मुंशी प्रेमचंद्र की पुण्यतिथि को समर्पित मेरी कविता 💐💐💐💐 आख़िर क्यों इतना मजबूर इस देश में अन्नदाता है... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी हम सभी का पालनहार यह धरती - माता ...

4. ९५. मानवता मानव के हाथों लूट गयी है @(पेज -129)

मानवता मानव के हाथों लूट गयी है... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी प्रतिस्पर्द्धा के इस दौड़ में, सबसे आगे निकलने की होड़ में, इंसानियत पीछे छूट गयी है, मानवता मानव के हाथों लूट गयी है ... सत्ता की मदहोशी में, परिवारवाद की बेहोशी में, लोकतंत्र की आबरू लूट गयी है, मानवता मानव के हाथों लूट गयी है ... भ्रष्टाचार के बाज़ार में, महत्वकांक्षा के नग्न संसार में, नैतिकता की क़िस्मत फुट गयी है, मानवता मानव के हाथों लूट गयी है, निज संतान के प्यार में, ससुराल के भावनात्मक अत्याचार में, माँ की ममता पीछे छूट गयी है, मानवता मानव के हाथों लूट गयी है... अपनों से टकरार में, स्वार्थ के हाहाकार में, पिता का आशियाना टूट गयी है, मानवता मानव के हाथों लूट गयी है... शान-शौकत के व्यापार में, धन्नासेठों के कालाबाजार में, ईमानदारी की क़िस्मत रूठ गयी है, मानवता मानव के हाथों लूट गयी है... प्रेमिका के प्यार में, फ़ैशन के बहार में, संस्कृति की हस्ती मिट गयी है, मानवता मानव के हाथों लूट गयी है... बुद्दिजीवियों के गुलजार में, अपने मुंह-मियां मिट्ठू बनने के खूमार में, कलम की धार कुंद हो गयी है, मानवता...

3. ससुराल में लड़की का दम छूटा था (पेज -128)

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ससुराल में लड़की का दम छूटा है ... ✍ बिपिन कुमार चौधरी ससुराल में दामाद रूठा है,  कुछ घंटो से भूखा है,  सास की ललाट तनी हुई है,  इसी कमबख्त ने मेरी गृहस्थी को लूटा है ... पत्नी की जुब...

2. ९२. स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है @ (पेज -127)

स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ... ✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी आधुनिकता के नए आयाम में, संस्कृति के संरक्षण-सम्मान में, जिंदगी की घुटन का एहसास करती है, स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ... पिता की इज्जत, माता के दिये संस्कार में, भाइयों की जिद्द, रिश्तेदारों के अहंकार में, अपनी दिल की बातों को जुबां से नहीं बयां करती है, स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ... हुनर के शिखर, जिंदगी के कठिन सफ़र में, समाज के गिद्ध निगाहों, शरीफों के गंदे बाज़ार में, पल पल आबरू की सुरक्षा के लिये संघर्ष करती है, स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ... मातृत्व की प्रतिष्ठा, कुल के सम्मान में, भ्रूण हत्या के क्रूरतम विज्ञान में, अपनों से अपने अंश के सुरक्षा के लिये लड़ती है, स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ... जात-पात और दहेज-दानव के घमासान में, अपनी पसंद के निरंकुश अपमान में, अपनों के लिये ग़लत निर्णय के विरोध से डरती है, स्त्री स्वयं अपने सपनों का उपहास करती है ... कुर्बानी और जिल्लत की इंतहां में, घर-परिवार के ख़ैरियत की पनाह में, तन्हाई के बीच दूसरों...