3. ससुराल में लड़की का दम छूटा था (पेज -128)
ससुराल में लड़की का दम छूटा है ...
✍ बिपिन कुमार चौधरी
ससुराल में दामाद रूठा है,
कुछ घंटो से भूखा है,
सास की ललाट तनी हुई है,
इसी कमबख्त ने मेरी गृहस्थी को लूटा है ...
पत्नी की जुबां खामोश है,
पति के दिल में आक्रोश है,
दामाद ने लाड़ टपकाया है,
नई डिजाईन का कार फ़रमाया है...
ससुर का मन भारी है,
बेटी आख़िर प्यारी है,
ख़्वाहिश हसरतें पूरी करने की है,
सिर पर कर्जा भी भारी है ...
साला को करियर की मारामारी है,
बूढ़े को दिल की गंभीर बीमारी है,
सिक्का जिसे खड़ा सोना समझा था,
बेटी की जिंदगी को बनाया कबाड़ी है..
हाँ बोलने की ओकाद नहीं है,
ना बोलने में पर क़िस्मत फ़ूटा है,
जिंदगी के इसी कश्मकश में,
दिल के कलेजे को किसी ने कई बार कुटा है...
दामाद अब भी रूठा है,
अपनी जिद्द पर गाड़ा खूंटा है,
मोहल्ले में बड़ी भीड़ जमी है,
ससुराल में लड़की का दम छूटा है ....

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