4. ९५. मानवता मानव के हाथों लूट गयी है @(पेज -129)
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है...
✍🏻 बिपिन कुमार चौधरी
प्रतिस्पर्द्धा के इस दौड़ में,
सबसे आगे निकलने की होड़ में,
इंसानियत पीछे छूट गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है ...
सत्ता की मदहोशी में,
परिवारवाद की बेहोशी में,
लोकतंत्र की आबरू लूट गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है ...
भ्रष्टाचार के बाज़ार में,
महत्वकांक्षा के नग्न संसार में,
नैतिकता की क़िस्मत फुट गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है,
निज संतान के प्यार में,
ससुराल के भावनात्मक अत्याचार में,
माँ की ममता पीछे छूट गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है...
अपनों से टकरार में,
स्वार्थ के हाहाकार में,
पिता का आशियाना टूट गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है...
शान-शौकत के व्यापार में,
धन्नासेठों के कालाबाजार में,
ईमानदारी की क़िस्मत रूठ गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है...
प्रेमिका के प्यार में,
फ़ैशन के बहार में,
संस्कृति की हस्ती मिट गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है...
बुद्दिजीवियों के गुलजार में,
अपने मुंह-मियां मिट्ठू बनने के खूमार में,
कलम की धार कुंद हो गयी है,
मानवता मानव के हाथों लूट गयी है,
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